Urdu Poetry: यही जाना कि कुछ न जाना हाए, सो भी इक उम्र में हुआ मालूम

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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यही जाना कि कुछ न जाना हाए
सो भी इक उम्र में हुआ मालूम
- मीर तक़ी मीर

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अक़्ल कहती है दोबारा आज़माना जहल है
दिल ये कहता है फ़रेब-ए-दोस्त खाते जाइए
- माहिर-उल क़ादरी

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किसी के तुम हो किसी का ख़ुदा है दुनिया में
मिरे नसीब में तुम भी नहीं ख़ुदा भी नहीं
- अख़्तर सईद ख़ान

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हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख़ामुशी क्या चीज़ है
- निदा फ़ाज़ली

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Urdu Poetry: ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया

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