Urdu Poetry: तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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तुम्हें ज़रूर कोई चाहतों से देखेगा
मगर वो आँखें हमारी कहाँ से लाएगा
- बशीर बद्र 

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क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाए क्यूँ
- मिर्ज़ा ग़ालिब 

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वो जिस घमंड से बिछड़ा गिला तो इस का है
कि सारी बात मोहब्बत में रख-रखाव की थी
- अहमद फ़राज़ 

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रात इक शख़्स बहुत याद आया
जिस घड़ी चाँद नुमूदार हुआ
- अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़ 

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Urdu Poetry: इधर कश्ती न ले आना यहाँ पानी बहुत कम है

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