अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
तिरी आवाज़ को इस शहर की लहरें तरसती हैं
ग़लत नंबर मिलाता हूँ तो पहरों बात होती है
- ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
ये भी एजाज़ मुझे इश्क़ ने बख़्शा था कभी
उस की आवाज़ से मैं दीप जला सकता था
- अहमद ख़याल
जिस तरह ख़्वाब मिरे हो गए रेज़ा रेज़ा
उस तरह से न कभी टूट के बिखरे कोई
- परवीन शाकिर
इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं
आने वाले बरसों ब'अद भी आते हैं
- ज़ेहरा निगाह
Urdu Poetry: वो ख़ुश-कलाम है ऐसा कि उस के पास हमें