अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ऐ काश हमारी क़िस्मत में ऐसी भी कोई शाम आ जाए
इक चाँद फ़लक पर निकला हो इक चाँद सर-ए-बाम आ जाए
- अनवर मिर्ज़ापुरी
आरज़ू है कि तू यहाँ आए
और फिर उम्र भर न जाए कहीं
- नासिर काज़मी
ख़्वाब, उम्मीद, तमन्नाएँ, तअल्लुक़, रिश्ते
जान ले लेते हैं आख़िर ये सहारे सारे
- इमरान-उल-हक़ चौहान
तुझ से किस तरह मैं इज़हार-ए-तमन्ना करता
लफ़्ज़ सूझा तो मआ'नी ने बग़ावत कर दी
- अहमद नदीम क़ासमी
Urdu Poetry: इतने घने बादल के पीछे, कितना तन्हा होगा चाँद