अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ
हम अपने शहर में होते तो घर गए होते
- उम्मीद फ़ाज़ली
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्रें बीत जाती हैं दिल को दिल बनाने में
- बशीर बद्र
न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा
हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा
- राहत इंदौरी
वो कहते हैं मैं ज़िंदगानी हूँ तेरी
ये सच है तो उन का भरोसा नहीं है
- आसी ग़ाज़ीपुरी
Urdu Poetry: पढ़ कर जो कोई फूँक दे अप्रैल मई जून