अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मैं मरीज़ हूँ तिरे हिज्र का ज़रा हाथ में मिरा हाथ ले
तू ग़मों का मेरे इलाज कर मिरी बात सुन तू अभी न जा
- अर्पित शर्मा अर्पित
कभी आँखें किताब में गुम हैं
कभी गुम है किताब आँखों में
- मोहम्मद अल्वी
ज़िंदगी ख़्वाब देखती है मगर
ज़िंदगी ज़िंदगी है ख़्वाब नहीं
- शबनम रूमानी
जो पूरे होने से रह गए थे वो ख़्वाब रक्खे हुए हैं घर में
यक़ीन मानो पुरानी रुत के गुलाब रक्खे हुए हैं घर में
- मोहम्मद मुबशशिर मेयो
Urdu Poetry: दिल में वो भीड़ है कि ज़रा भी नहीं जगह