अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा
वगर्ना ज़िंदगी भर को रुला दिया होता
- गुलज़ार
गुलशन की फ़क़त फूलों से नहीं काँटों से भी ज़ीनत होती है
जीने के लिए इस दुनिया में ग़म की भी ज़रूरत होती है
- सबा अफ़ग़ानी
अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है
मुद्दत हुई सोचा था कि घर जाएँगे इक दिन
- साक़ी फ़ारुक़ी
ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में
हर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
Urdu Poetry: तिरे वादे पर जिए हम तो ये जान झूट जाना