अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी
वो बात अपनी जगह है ये बात अपनी जगह
- बासिर सुल्तान काज़मी
जिस की अदा अदा पे हो इंसानियत को नाज़
मिल जाए काश ऐसा बशर ढूँढ़ते हैं हम
- आजिज़ मातवी
इश्क़ में कौन बता सकता है
किस ने किस से सच बोला है
- अहमद मुश्ताक़
कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया
- जौन एलिया
Urdu Poetry: हमारे घर की दीवारों पे 'नासिर' उदासी बाल खोले सो रही है