Urdu Poetry: गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी
वो बात अपनी जगह है ये बात अपनी जगह
- बासिर सुल्तान काज़मी  

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जिस की अदा अदा पे हो इंसानियत को नाज़
मिल जाए काश ऐसा बशर ढूँढ़ते हैं हम
- आजिज़ मातवी

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इश्क़ में कौन बता सकता है
किस ने किस से सच बोला है
- अहमद मुश्ताक़

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कैसे कहें कि तुझ को भी हम से है वास्ता कोई
तू ने तो हम से आज तक कोई गिला नहीं किया
- जौन एलिया

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