अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
तुम मोहब्बत को खेल कहते हो
हम ने बर्बाद ज़िंदगी कर ली
- बशीर बद्र
तुम मेरे लिए अब कोई इल्ज़ाम न ढूँढ़ो
चाहा था तुम्हें इक यही इल्ज़ाम बहुत है
- साहिर लुधियानवी
रोज़ दीवार में चुन देता हूँ मैं अपनी अना
रोज़ वो तोड़ के दीवार निकल आती है
- ख़ुर्शीद तलब
Urdu Poetry: किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी