अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
- निदा फ़ाज़ली
हज़ार चेहरे हैं मौजूद आदमी ग़ाएब
ये किस ख़राबे में दुनिया ने ला के छोड़ दिया
- शहज़ाद अहमद
गिरेगी कल भी यही धूप और यही शबनम
इस आसमाँ से नहीं और कुछ उतरने का
- हकीम मंज़ूर
एक चराग़ और एक किताब और एक उम्मीद असासा
उस के बा'द तो जो कुछ है वो सब अफ़्साना है
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
Urdu Poetry: बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना