Urdu Poetry: ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ काश तुझ को भी इक झलक देखूँ

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ
- उबैदुल्लाह अलीम   

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बारहा तेरा इंतिज़ार किया
अपने ख़्वाबों में इक दुल्हन की तरह
- परवीन शाकिर 

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ज़िंदगी ख़्वाब देखती है मगर
ज़िंदगी ज़िंदगी है ख़्वाब नहीं
- शबनम रूमानी 

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रात को सोना न सोना सब बराबर हो गया
तुम न आए ख़्वाब में आँखों में ख़्वाब आया तो क्या
- जलील मानिकपुरी 

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Urdu Poetry: अपना घर आने से पहले इतनी गलियाँ क्यूँ आती हैं

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