Urdu Poetry: तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था
उस को भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था
- हबीब जालिब 

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दुनिया में वही शख़्स है ताज़ीम के क़ाबिल
जिस शख़्स ने हालात का रुख़ मोड़ दिया हो
- अज्ञात 

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काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब
मेरा ना'रा इंक़िलाब ओ इंक़िलाब ओ इंक़िलाब
- जोश मलीहाबादी 

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क्या तिरे शहर के इंसान हैं पत्थर की तरह
कोई नग़्मा कोई पायल कोई झंकार नहीं
- कामिल बहज़ादी 

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Urdu Poetry: ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहें जिसे

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