अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
उस की आँखों में उतर जाने को जी चाहता है
शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है
- कफ़ील आज़र अमरोहवी
दिन किसी तरह से कट जाएगा सड़कों पे 'शफ़क़'
शाम फिर आएगी हम शाम से घबराएँगे
- फ़ारूक़ शफ़क़
दिन किसी तरह से कट जाएगा सड़कों पे 'शफ़क़'
शाम फिर आएगी हम शाम से घबराएँगे
- फ़ारूक़ शफ़क़
बस्ती बस्ती पर्बत पर्बत वहशत की है धूप 'ज़िया'
चारों जानिब वीरानी है दिल का इक वीराना क्या
- अहमद ज़िया
Urdu Poetry: ग़म और ख़ुशी में फ़र्क़ न महसूस हो जहाँ