अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए
तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए
- बशीर बद्र
बात तक करनी न आती थी तुम्हें
ये हमारे सामने की बात है
- दाग़ देहलवी
रखना है कहीं पाँव तो रक्खो हो कहीं पाँव
चलना ज़रा आया है तो इतराए चलो हो
- कलीम आजिज़
मुट्ठियों में ख़ाक ले कर दोस्त आए वक़्त-ए-दफ़्न
ज़िंदगी भर की मोहब्बत का सिला देने लगे
- साक़िब लखनवी
Urdu Poetry: उसी मक़ाम से अब अपना रास्ता होगा