अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
साहिल के सुकूँ से किसे इंकार है लेकिन
तूफ़ान से लड़ने में मज़ा और ही कुछ है
- आल-ए-अहमद सुरूर
कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी
सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी
- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
'अमीर' अब हिचकियाँ आने लगी हैं
कहीं मैं याद फ़रमाया गया हूँ
- अमीर मीनाई
मिरे हालात को बस यूँ समझ लो
परिंदे पर शजर रक्खा हुआ है
- शुजा ख़ावर
Urdu Poetry: जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता