Urdu Poetry: यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का
यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का
- शहरयार 

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मुझे भी लम्हा-ए-हिजरत ने कर दिया तक़्सीम
निगाह घर की तरफ़ है क़दम सफ़र की तरफ़
- शहपर रसूल

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सुब्ह होते ही निकल आते हैं बाज़ार में लोग
गठरियाँ सर पे उठाए हुए ईमानों की
- अहमद नदीम क़ासमी

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अगर बदल न दिया आदमी ने दुनिया को
तो जान लो कि यहाँ आदमी की ख़ैर नहीं
- फ़िराक़ गोरखपुरी

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Urdu Poetry: तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं

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