अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
इश्क़ नाज़ुक-मिज़ाज है बेहद
अक़्ल का बोझ उठा नहीं सकता
- अकबर इलाहाबादी
करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता
- ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हम से ये बार-ए-लुत्फ़ उठाया न जाएगा
एहसाँ ये कीजिए कि ये एहसाँ न कीजिए
- हफ़ीज़ जालंधरी
रेज़ा रेज़ा कर दिया जिस ने मिरे एहसास को
किस क़दर हैरान है वो मुझ को यकजा देख कर
- ख़ुशबीर सिंह शाद
Urdu Poetry: जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए