अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मुझे तन्हाई की आदत है मेरी बात छोड़ें
ये लीजे आप का घर आ गया है हाथ छोड़ें
- जावेद सबा
भीड़ तन्हाइयों का मेला है
आदमी आदमी अकेला है
- सबा अकबराबादी
शोर दिन को नहीं सोने देता
शब को सन्नाटा जगा देता है
- सैफ़ुद्दीन सैफ़
उन की हसरत भी नहीं मैं भी नहीं दिल भी नहीं
अब तो 'बेख़ुद' है ये आलम मिरी तंहाई का
- बेखुद बदायूंनी
तू मेरे साथ नहीं है तो सोचता हूँ मैं
कि अब तो तुझ से बिछड़ने का कोई डर भी नहीं
- शाहिद कमाल
पंछी सारे पेड़ से उड़ जाएँगे
सहन में इक ख़ामुशी रह जाएगी
- अफ़ज़ल हज़ारवी
Urdu Poetry: कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है, ज़िंदगी एक नज़्म लगती है