Urdu Poetry: किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
- अहमद फ़राज़ 

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क़िस्मत तो देख टूटी है जा कर कहाँ कमंद
कुछ दूर अपने हाथ से जब बाम रह गया
- क़ाएम चाँदपुरी

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ख़ुश-नसीबी में है यही इक ऐब
बद-नसीबों के घर नहीं आती
- रसा जालंधरी

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तुम्हें पता है मिरे हाथ की लकीरों में
तुम्हारे नाम के सारे हुरूफ़ बनते हैं
- फ़रीहा नक़वी

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क़ब्रों में नहीं हम को किताबों में उतारो
हम लोग मोहब्बत की कहानी में मरें हैं
- एजाज़ तवक्कल 

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कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए
वो सो गया है मुझे ख़्वाब से जगाते हुए
- सलीम कौसर

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Urdu Poetry: कौन सी बात है तुम में ऐसी

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