अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
एक वो हैं कि जिन्हें अपनी ख़ुशी ले डूबी
एक हम हैं कि जिन्हें ग़म ने उभरने न दिया
- आज़ाद गुलाटी
फिर दे के ख़ुशी हम उसे नाशाद करें क्यूँ
ग़म ही से तबीअत है अगर शाद किसी की
- हफ़ीज़ जालंधरी
मुस्कुराना भी एक फ़न है 'अज़ीज़'
सब को आता नहीं ज़माने में
- अज़ीज़ ग़व्वासी
पता अब तक नहीं बदला हमारा
वही घर है वही क़िस्सा हमारा
- अहमद मुश्ताक़
अपना घर आने से पहले
इतनी गलियाँ क्यूँ आती हैं
- मोहम्मद अल्वी
कब आओगे ये घर ने मुझ से चलते वक़्त पूछा था
यही आवाज़ अब तक गूँजती है मेरे कानों में
- कफ़ील आज़र अमरोहवी
Urdu Poetry: कि उसी के हो गए हम जो न हो सका हमारा