अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
'मीर' बंदों से काम कब निकला
माँगना है जो कुछ ख़ुदा से माँग
- मीर तक़ी मीर
झोलियाँ सब की भरती जाती हैं
देने वाला नज़र नहीं आता
- अमजद हैदराबादी
ये ग़म क्या दिल की 'आदत है नहीं तो
किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो
- जौन एलिया
वो बात ज़रा सी जिसे कहते हैं ग़म-ए-दिल
समझाने में इक उम्र गुज़र जाए है प्यारे
- कलीम आजिज़
हम ने तुम्हारे ग़म को हक़ीक़त बना दिया
तुम ने हमारे ग़म के फ़साने बनाए हैं
- ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
हमें दुनिया में अपने ग़म से मतलब
ज़माने की ख़ुशी से वास्ता क्या
- अलीम अख़्तर मुज़फ़्फ़र नगरी
Urdu Poetry: देखी थी एक रात तिरी ज़ुल्फ़ ख़्वाब में