अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कोई मंज़िल के क़रीब आ के भटक जाता है
कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से
- क़सरी कानपुरी
अपने माथे की शिकन तुम से मिटाई न गई
अपनी तक़दीर के बल हम से निकाले न गए
- जलील मानिकपुरी
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है
रहे सामने और दिखाई न दे
- बशीर बद्र
इलाही एक ग़म-ए-रोज़गार क्या कम था
कि इश्क़ भेज दिया जान-ए-मुब्तला के लिए
- हफ़ीज़ जालंधरी
Urdu Poetry: यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं