अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
मुसाफ़िर ही मुसाफ़िर हर तरफ़ हैं
मगर हर शख़्स तन्हा जा रहा है
- अहमद नदीम क़ासमी
मुसाफ़िर तिरा ज़िक्र करते रहे
महकता रहा रास्ता देर तक
- अक़ील नोमानी
मुसाफ़िर हैं हम भी मुसाफ़िर हो तुम भी
किसी मोड़ पर फिर मुलाक़ात होगी
- बशीर बद्र
इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे
- बशीर बद्र
हम से क्या हो सका मोहब्बत में
ख़ैर तुम ने तो बेवफ़ाई की
- फ़िराक़ गोरखपुरी
सोचता हूँ कि उस की याद आख़िर
अब किसे रात भर जगाती है
- जौन एलिया
Urdu Poetry: आप का ख़त नहीं मिला मुझ को