अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
है अजीब शहर की ज़िंदगी न सफ़र रहा न क़याम है
कहीं कारोबार सी दोपहर कहीं बद-मिज़ाज सी शाम है
- बशीर बद्र
ज़िंदगी है अपने क़ब्ज़े में न अपने बस में मौत
आदमी मजबूर है और किस क़दर मजबूर है
- अहमद आमेठवी
कौन जीने के लिए मरता रहे
लो सँभालो अपनी दुनिया हम चले
- अख़्तर सईद ख़ान
तुम्हारी याद के साए भी कुछ सिमट से गए
ग़मों की धूप तो बाहर थी अक्स अंदर था
- मुबारक शमीम
इक अदना सा शा'इर हूँ मैं लाखों में
अपनी इक पहचान बनाता रहता हूँ
- अफ़ज़ल हज़ारवी
इधर फ़लक को है ज़िद बिजलियाँ गिराने की
उधर हमें भी है धुन आशियाँ बनाने की
- अज्ञात
Urdu Poetry: बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर