अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो
- मोमिन ख़ाँ मोमिन
मिरे सूरज आ! मिरे जिस्म पे अपना साया कर
बड़ी तेज़ हवा है सर्दी आज ग़ज़ब की है
- शहरयार
किसी भी प्यास के मारे की प्यास बुझ न सकी
समुंदरों में तो आते रहे उछाल बहुत
- बख़्श लाइलपुरी
तुम भी इस शहर में बन जाओगे पत्थर जैसे
हँसने वाला यहाँ कोई है न रोने वाला
- कैलाश माहिर
मुझ से तू पूछने आया है वफ़ा के मअ'नी
ये तिरी सादा-दिली मार न डाले मुझ को
- क़तील शिफ़ाई
वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो
हौसले मुश्किलों में पलते हैं
- महफूजुर्रहमान आदिल
Urdu Poetry: हम फ़क़ीरों का पैरहन है धूप