अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
दिल के आँगन में उभरता है तिरा अक्स-ए-जमील
चाँदनी रात में हो रात की रानी जैसे
- इरफ़ाना अज़ीज़
दरियाओं की नज़्र हुए
धीरे धीरे सब तैराक
- आशुफ़्ता चंगेज़ी
आएँ हैं समझाने लोग
हैं कितने दीवाने लोग
- कुँवर महेंद्र सिंह बेदी सहर
तुम लगाते चलो अश्जार जिधर से गुज़रो
उस के साए में जो बैठेगा दुआ ही देगा
- अज्ञात
मुझे ज़िंदगी की दुआ देने वाले
हँसी आ रही है तिरी सादगी पर
- गोपाल मित्तल
हर नए हादसे पे हैरानी
पहले होती थी अब नहीं होती
- बाक़ी सिद्दीक़ी
Urdu Poetry: तुम मोहब्बत को खेल कहते हो