Urdu Poetry: जो कि पेशानी पे लिक्खी है वो पेश आनी है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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जुस्तुजू करनी हर इक अम्र में नादानी है
जो कि पेशानी पे लिक्खी है वो पेश आनी है
- इमाम बख़्श नासिख़    

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वस्ल की बनती हैं इन बातों से तदबीरें कहीं
आरज़ूओं से फिरा करती हैं तक़दीरें कहीं
- हसरत मोहानी 

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इतना ख़ाली था अंदरूँ मेरा
कुछ दिनों तो ख़ुदा रहा मुझ में
- जौन एलिया 

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मिरे गुनाह ज़ियादा हैं या तिरी रहमत
करीम तू ही बता दे हिसाब कर के मुझे
- मुज़्तर ख़ैराबादी 

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