अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
ये कैसे लोग हैं ये कौन सी 'अदावत है
ज़रा सी बात में जो ख़ानदान तक जाएँ
- अन्नू रिज़वी
और क्या चाहती है गर्दिश-ए-अय्याम कि हम
अपना घर भूल गए उन की गली भूल गए
- जौन एलिया
भीड़ के ख़ौफ़ से फिर घर की तरफ़ लौट आया
घर से जब शहर में तन्हाई के डर से निकला
- अलीम मसरूर
सफ़र में ऐसे कई मरहले भी आते हैं
हर एक मोड़ पे कुछ लोग छूट जाते हैं
- आबिद अदीब
आए ठहरे और रवाना हो गए
ज़िंदगी क्या है, सफ़र की बात है
- हैदर अली जाफ़री
आरज़ू है कि तू यहाँ आए
और फिर उम्र भर न जाए कहीं
- नासिर काज़मी
Urdu Poetry: उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो