अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता
- ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
- जिगर मुरादाबादी
भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए
- ख़ुमार बाराबंकवी
कश्ती चला रहा है मगर किस अदा के साथ
हम भी न डूब जाएँ कहीं ना-ख़ुदा के साथ
- अब्दुल हमीद अदम
Urdu Poetry: किस से पूछूँ कि कहाँ गुम हूँ कई बरसों से