Urdu Poetry: काश तुझ को भी इक झलक देखूँ

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ
- उबैदुल्लाह अलीम

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क्या हसीं ख़्वाब मोहब्बत ने दिखाया था हमें
खुल गई आँख तो ताबीर पे रोना आया
- शकील बदायूंनी

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पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं
- निदा फ़ाज़ली

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उस के चेहरे की चमक के सामने सादा लगा
आसमाँ पे चाँद पूरा था मगर आधा लगा
- इफ़्तिख़ार नसीम

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Urdu Poetry: कोई मंज़िल पे पहुँचता है भटक जाने से

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