Urdu Poetry: ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं
फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

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बुरा बुरे के अलावा भला भी होता है
हर आदमी में कोई दूसरा भी होता है
- अनवर शऊर

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बना रहा हूँ मैं फ़ेहरिस्त छोटे लोगों की
मलाल ये कि बड़े नाम इस में आते हैं
- एजाज़ तवक्कल

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तुम से बिछड़ कर ज़िंदा हैं
जान बहुत शर्मिंदा हैं
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

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Urdu Poetry: ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया

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