Urdu Poetry: कभी साया है कभी धूप मुक़द्दर मेरा

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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कभी साया है कभी धूप मुक़द्दर मेरा
होता रहता है यूँ ही क़र्ज़ बराबर मेरा
- अतहर नफ़ीस

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आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता
- दाग़ देहलवी

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मैं रोना चाहता हूँ ख़ूब रोना चाहता हूँ मैं
फिर उस के बाद गहरी नींद सोना चाहता हूँ मैं
- फ़रहत एहसास

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दर्द ऐसा है कि जी चाहे है ज़िंदा रहिए
ज़िंदगी ऐसी कि मर जाने को जी चाहे है
- कलीम आजिज़

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Urdu Poetry: दिल को कई कहानियाँ याद सी आ के रह गईं

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