अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
आ जाए न दिल आप का भी और किसी पर
देखो मिरी जाँ आँख लड़ाना नहीं अच्छा
- भारतेंदु हरिश्चंद्र
हाँ कभी ख़्वाब-ए-इश्क़ देखा था
अब तक आँखों से ख़ूँ टपकता है
- अख़्तर अंसारी
बदले हुए से लगते हैं अब मौसमों के रंग
पड़ता है आसमान का साया ज़मीन पर
- हमदम कशमीरी
बदले हुए से लगते हैं अब मौसमों के रंग
पड़ता है आसमान का साया ज़मीन पर
- हमदम कशमीरी
Urdu Poetry: भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम