अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हक़ीक़त छुप नहीं सकती बनावट के उसूलों से
कि ख़ुशबू आ नहीं सकती कभी काग़ज़ के फूलों से
- मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी तरक़्क़ी
बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी
जैसी अब है तिरी महफ़िल कभी ऐसी तो न थी
- बहादुर शाह ज़फ़र
गर्मी-ए-हसरत-ए-नाकाम से जल जाते हैं
हम चराग़ों की तरह शाम से जल जाते हैं
- क़तील शिफ़ाई
न वो इक़रार करता है न वो इंकार करता है
हमें फिर भी गुमाँ है वो हमीं से प्यार करता है
- हसन रिज़वी
Urdu Poetry: पलकों की हद को तोड़ के दामन पे आ गिरा