अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हमें माशूक़ को अपना बनाना तक नहीं आता
बनाने वाले आईना बना लेते हैं पत्थर से
- सफ़ी औरंगाबादी
ज़र्रा समझ के यूँ न मिला मुझ को ख़ाक में
ऐ आसमान मैं भी कभी आफ़्ताब था
- लाला माधव राम जौहर
इंसान की बुलंदी ओ पस्ती को देख कर
इंसाँ कहाँ खड़ा है हमें सोचना पड़ा
- हबीब हैदराबादी
शायरी है सरमाया ख़ुश-नसीब लोगों का
बाँस की हर इक टहनी बाँसुरी नहीं होती
- हस्तीमल हस्ती
Urdu Poetry: मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का