अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
पलकों की हद को तोड़ के दामन पे आ गिरा
इक अश्क मेरे सब्र की तौहीन कर गया
- अज्ञात
ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़
डरते हैं ऐ ज़मीन तिरे आदमी से हम
- अज्ञात
सब से पुर-अम्न वाक़िआ ये है
आदमी आदमी को भूल गया
- जौन एलिया
ज़िंदगी है या कोई तूफ़ान है!
हम तो इस जीने के हाथों मर चले
- ख़्वाजा मीर दर्द
Izhaar- E- Ishq Shayari: तुम्हें मुझ से मोहब्बत हो गई क्या