Urdu Poetry: लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली  

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इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे
- बशीर बद्र 

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शाख़ें रहीं तो फूल भी पत्ते भी आएँगे
ये दिन अगर बुरे हैं तो अच्छे भी आएँगे
- अज्ञात

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कुछ और सबक़ हम को ज़माने ने सिखाए
कुछ और सबक़ हम ने किताबों में पढ़े थे
- हस्तीमल हस्ती 

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खुली किताब थी फूलों-भरी ज़मीं मेरी
किताब मेरी थी रंग-ए-किताब उस का था
- वज़ीर आग़ा 

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Urdu Poetry: काश तुझ को भी इक झलक देखूँ

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