अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हज़ारों ज़ुल्म हों मज़लूम पर तो चुप रहे दुनिया
अगर मज़लूम कुछ बोले तो दहशत-गर्द कहती है
- ज़मीर अतरौलवी
मुझ को अब कैसे पा सकेगा कोई
वक़्त था और गुज़र गया हूँ मैं
- शारिक़ जमाल
दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए
सामने आइना रख लिया कीजिए
- ख़ुमार बाराबंकवी
इत्तिफ़ाक़ अपनी जगह ख़ुश-क़िस्मती अपनी जगह
ख़ुद बनाता है जहाँ में आदमी अपनी जगह
- अनवर शऊर
Urdu Poetry: ज़िंदगी कम पढ़े परदेसी का ख़त है 'इबरत'