Urdu Poetry: अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता
- मिर्ज़ा ग़ालिब

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हमें भी आज ही करना था इंतिज़ार उस का
उसे भी आज ही सब वादे भूल जाने थे
- आशुफ़्ता चंगेज़ी

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उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा
- निदा फ़ाज़ली

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भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए
- ख़ुमार बाराबंकवी

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Urdu Poetry: गिला भी तुझ से बहुत है मगर मोहब्बत भी

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