अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
आहटें सुन रहा हूँ यादों की
आज भी अपने इंतिज़ार में गुम
- रसा चुग़ताई
कोई हलचल है न आहट न सदा है कोई
दिल की दहलीज़ पे चुप-चाप खड़ा है कोई
- ख़ुर्शीद अहमद जामी
या वो थे ख़फ़ा हम से या हम हैं ख़फ़ा उन से
कल उन का ज़माना था आज अपना ज़माना है
- जिगर मुरादाबादी
ख़फ़ा हैं फिर भी आ कर छेड़ जाते हैं तसव्वुर में
हमारे हाल पर कुछ मेहरबानी अब भी होती है
- अख़्तर शीरानी
Urdu Poetry: ये शुक्र है कि मिरे पास तेरा ग़म तो रहा