अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कुछ दिन से ज़िंदगी मुझे पहचानती नहीं
यूँ देखती है जैसे मुझे जानती नहीं
- अंजुम रहबर
बड़ा घाटे का सौदा है 'सदा' ये साँस लेना भी
बढ़े है उम्र ज्यूँ-ज्यूँ ज़िंदगी कम होती जाती है
- सदा अम्बालवी
हमारी ज़िंदगी तो मुख़्तसर सी इक कहानी थी
भला हो मौत का जिस ने बना रक्खा है अफ़्साना
- बेदम शाह वारसी
ऐ अदम के मुसाफ़िरो होशियार
राह में ज़िंदगी खड़ी होगी
- साग़र सिद्दीक़ी
Urdu Poetry: जो गुज़ारी न जा सकी हम से हम ने वो ज़िंदगी गुज़ारी है