Urdu Poetry: मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है ख़मोशी भी है ये आवाज़ भी है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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मोहब्बत सोज़ भी है साज़ भी है
ख़मोशी भी है ये आवाज़ भी है
- अर्श मलसियानी 

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बोलते रहना क्यूँकि तुम्हारी बातों से
लफ़्ज़ों का ये बहता दरिया अच्छा लगता है
- अज्ञात 

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धीमे सुरों में कोई मधुर गीत छेड़िए
ठहरी हुई हवाओं में जादू बिखेरिए
- परवीन शाकिर 

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उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा
- निदा फ़ाज़ली

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Urdu Poetry: अगर बदल न दिया आदमी ने दुनिया को तो

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