अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हम फ़क़ीरों का पैरहन है धूप
और ये रात अपनी चादर है
- आबिद वदूद
बस जान गया मैं तिरी पहचान यही है
तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता
- अकबर इलाहाबादी
जग में आ कर इधर उधर देखा
तू ही आया नज़र जिधर देखा
- ख़्वाजा मीर दर्द
तू ही ज़ाहिर है तू ही बातिन है
तू ही तू है तो मैं कहाँ तक हूँ
- इस्माइल मेरठी
तमाम होश की दुनिया निसार है उस पर
तिरी गली में जिसे नींद आ गई होगी
- फ़ना बुलंदशहरी
गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केस
चल 'ख़ुसरो' घर आपने रैन भई चहूँ देस
- अमीर ख़ुसरो
Urdu Poetry: फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना