Urdu Poetry: कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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कभी तो आसमाँ से चाँद उतरे जाम हो जाए
तुम्हारे नाम की इक ख़ूब-सूरत शाम हो जाए
- बशीर बद्र 

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किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को
काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के
- आदिल मंसूरी

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खो दिया तुम को तो हम पूछते फिरते हैं यही
जिस की तक़दीर बिगड़ जाए वो करता क्या है
- फ़िराक़ गोरखपुरी

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क्या हसीं ख़्वाब मोहब्बत ने दिखाया था हमें
खुल गई आँख तो ताबीर पे रोना आया
- शकील बदायूंनी 

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Urdu Poetry: हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

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