अमर उजाला काव्य डेस्क
मेरी हर साँस है इस बात की शाहिद ऐ मौत
मैं ने हर लुत्फ़ के मौक़े पे तुझे याद किया
आप इक जल्वा सरासर मैं सरापा इक नज़र
अपनी हाजत देखिए मेरी ज़रूरत देखिए
हवाएँ ज़ोर कितना ही लगाएँ आँधियाँ बन कर
मगर जो घिर के आता है वो बादल छा ही जाता है
शाइरी क्यूँ न रास आए मुझे
ये मिरा फ़न्न-ए-ख़ानदानी है
या रब ये भेद क्या है कि राहत की फ़िक्र ने
इंसाँ को और ग़म में गिरफ़्तार कर दिया
हद है अपनी तरफ़ नहीं मैं भी
और उन की तरफ़ ख़ुदाई है
हद है अपनी तरफ़ नहीं मैं भी
और उन की तरफ़ ख़ुदाई है
एक दिन कह लीजिए जो कुछ है दिल में आप के
एक दिन सुन लीजिए जो कुछ हमारे दिल में है
Urdu Poetry: अमीर मीनाई के चुनिंदा शेर