अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मुयस्सर नहीं इंसाँ होना
- मिर्ज़ा ग़ालिब
फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना
मगर इस में लगती है मेहनत ज़ियादा
- अल्ताफ़ हुसैन हाली
मुस्तक़िल बोलता ही रहता हूँ
कितना ख़ामोश हूँ मैं अंदर से
- जौन एलिया
वहाँ हमारा कोई मुंतज़िर नहीं फिर भी
हमें न रोक कि घर जाना चाहते हैं हम
- वाली आसी
Urdu Poetry: इल्म की इब्तिदा है हंगामा इल्म की इंतिहा है ख़ामोशी