Urdu Poetry: ज़िंदगी एक नज़्म लगती है

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली 

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कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है
- गुलज़ार 

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शहर में किस से सुख़न रखिए किधर को चलिए
इतनी तन्हाई तो घर में भी है घर को चलिए
- नसीर तुराबी 

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शहर में किस से सुख़न रखिए किधर को चलिए
इतनी तन्हाई तो घर में भी है घर को चलिए
- नसीर तुराबी 

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दिल तो मेरा उदास है 'नासिर'
शहर क्यूँ साएँ साएँ करता है
- नासिर काज़मी 

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Urdu Poetry: शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है

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