अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
इतनी मिलती है मिरी ग़ज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझ को मिरा महबूब समझते होंगे
- बशीर बद्र
कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ
उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की
- गुलज़ार
ज़िंदगी यूँही बहुत कम है मोहब्बत के लिए
रूठ कर वक़्त गँवाने की ज़रूरत क्या है
- अज्ञात
तुम से छुट कर भी तुम्हें भूलना आसान न था
तुम को ही याद किया तुम को भुलाने के लिए
- निदा फ़ाज़ली
इलाज अपना कराते फिर रहे हो जाने किस किस से
मोहब्बत कर के देखो ना मोहब्बत क्यूँ नहीं करते
- फ़रहत एहसास
इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा
आदमी काम का नहीं होता
- जिगर मुरादाबादी
Urdu Poetry: ज़िंदगी एक फ़न है लम्हों को, अपने अंदाज़ से गँवाने का