अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए
- जाँ निसार अख़्तर
रहता सुख़न से नाम क़यामत तलक है 'ज़ौक़'
औलाद से रहे यही दो पुश्त चार पुश्त
- शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए
एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया
- ऐतबार साजिद
सुख़न में सहल नहीं जाँ निकाल कर रखना
ये ज़िंदगी है हमारी सँभाल कर रखना
- उबैदुल्लाह अलीम
उस का तो एक लफ़्ज़ भी हम को नहीं है याद
कल रात एक शेर कहा था जो ख़्वाब में
- कमाल अहमद सिद्दीक़ी
ख़ास अंदाज़ जब सुख़न का न हो
शाएरी शाएरी नहीं होती
- वेद राही
Urdu Poetry: ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं