अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली
कभी मैं अपने हाथों की लकीरों से नहीं उलझा
मुझे मालूम है क़िस्मत का लिक्खा भी बदलता है
- बशीर बद्र
बद-क़िस्मती को ये भी गवारा न हो सका
हम जिस पे मर मिटे वो हमारा न हो सका
- शकेब जलाली
सुना है अब भी मिरे हाथ की लकीरों में
नजूमियों को मुक़द्दर दिखाई देता है
- अमीर क़ज़लबाश
ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ
- उबैदुल्लाह अलीम
Urdu Poetry: अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के